डाळिंब
लागवडीसाठी हवामान :-
उष्ण
दिर्घ उन्हाळा कोरडी हवा
साधारण हिवाळा
डाळिंब
लागवडीसाठी जमिन :-
हलकि
ते मध्यम प्रकारची जमिन व
चुनखडी
कमी
प्रमाणात उत्तम निच-याची
,
हलक्या
ते
मध्यम
प्रतिची जमिन
लागवडीनंतर
फळ घेणेकरिता थांबणेचा कालावधी
२ वर्ष ,
रोपाची
लागवड करताना दोन रांगामध्ये
१२ फुट व दोन रांगातील दोन
झाडांमध्ये १० फुट
अंतर
पिके :-
झेंडु
,
चवळी
इ.
कमी
उंचीने वाढणारी पिके
जाती:-
१)
गणेश
– फळ आकाराने मध्यम
२)
जी
१३७ – दाणे मऊ रंग किंचित गडद
३)
मृदुला
(
गणेश
x
बुल-ए-शाह
रेड संकरित महात्मा फुले कृषी
विद्यापीठ)
– फळ
आकाराने मध्यम ,
फळाचा
रंग व दाण्याचा रंग गडद लाल
,फळ
३०० ते ३५० ग्रॅम
४)
आरक्ता
– आकर्षक दाणे,
साल
चमकदार ,गडद
लाल रंग
५)
भगवा
– बाजारपेठेसाठी उपयुक्त दर
,
फळे
१८० ते १९० दिवसांत परिपक्व
होतात
६)
खुले
आरक्ता -
गणेश
x
बुल-ए-शाह
रेड संकरित महात्मा फुले कृषी
विद्यापीठ
जमिन
व इतर बाबी :-
१)
माती
व देठ परिक्षण करुन खतमात्रांचे
नियोजन करावे,
एकात्मिक
खते व्यवस्थापन करावे
लागवड
:-
जमिनीची
चांगली नांगरण करुन प्लॉट
सपाटकरावा प्रतिरोपाकरिता
2x2x2(
लांबी
,
रुंदी,
खोली
)खड्डा
करावा त्यामध्ये शेणखत निंबोळी
पेंड ,
ट्रायकोडर्मा
(
बुरशी
)
टाकणे
.
रोप
लावलेवर त्यावरती तंबाखु
पावडर डस्टींग करावी.बुरशी
जन्य रोगांकरिता बोर्डेक्स
मिश्रण किंवा कॉपर ऑक्सी
क्लोराईट व हुमणी किंवा वाळवी
करिता क्लोरोपायरीफॉस पाण्यात
मिक्स करुन मुळांवर ओतावे.
व
पावसाळी हवामान असलेस बोर्डेक्स
मिश्रण किंवा कॉपर ऑक्सी
क्लोराईट बुरशी नाशक फवारावे
.
खतांचा
वापर :-
|
अ.
क्र.
|
वर्ष
(वय)
|
शेणखताचे
प्रमाण
|
शेरा
|
|
१
|
१
|
१०
किलो
|
पहिल्या
पाण्याच्या वेळेस शेणखत
द्यावे शेणखत कुजलेले असावे
व वाळवी येवु नये याकरिता
खत वापर ल्यावर क्लोरोपायरीफॉस
पाण्यात मिक्स करुन मुळांवर
ओतावे
|
|
२
|
२
|
२०
किलो
|
|
|
३
|
३
|
३०
किलो
|
|
|
४
|
४
|
४०
किलो
|
|
|
५
|
५<
जास्त
|
५०
किलो
|
बहाराची
पहिली मात्रा
|
बहर
|
लेंडी
खत
|
कोंबडी
खत
|
निंबोळी
पेंड |
रा.
खत
सिंगल सुपर कॉसटेक
|
|
१
|
१५
किलो
|
१०
किलो
|
अर्धा
किलो
|
अर्धा
किलो
|
|
२ |
२०
किलो
|
१५
किलो |
१
किलो |
७५०
ग्रॅम
|
|
३ |
२५
किलो |
२०
किलो |
दीड
किलो
|
१
किलो |
|
अ.
क्र. |
अवस्था
|
पहिला
बहर
|
दुसरा
बहर
|
तिसरा
बहर
|
|||||||
|
|
|
N |
P2o5 |
K2O
|
N |
P2o5 |
K2O
|
N |
P2o5 |
K2O
|
|
|
१ |
पहिले
पाणी देणेपुर्वी
|
५० |
१५० |
२५ |
७५ |
२०० |
५० |
१०० |
२५० |
५० |
|
|
२ |
फळ
धरणा
|
७५ |
१०० |
२५ |
१२५ |
१५० |
५० |
१५० |
२०० |
७५ |
|
|
३ |
लिंबु
आकाराचे फळ
|
१०० |
१५० |
० |
१५० |
२०० |
० |
२०० |
२५० |
० |
|
|
४ |
पेरु
आकाराचे फळ
|
५० |
२०० |
५० |
१०० |
२५० |
१०० |
१५० |
३०० |
१५० |
|
|
५ |
रंग
येण्याची अवस्था
|
७५ |
५० |
७५ |
१५० |
१०० |
१५० |
२०० |
१५० |
२०० |
|
|
६ |
गोडी
व वजन वाढ |
७५ |
० |
१२५ |
१५० |
० |
२०० |
२०० |
० |
२५० |
|
वरिल
सर्व खते ग्रॅम मध्ये असुन
युरिया खत देताना नत्र (
N ) मिळतो
युरिया मध्ये ४६ %
नत्र
असते.
म्हणुन
५० ग्रॅम नत्र देताना २३००
ग्रॅम युरिया देणे .
सिंगर
सुपर फ़ॉसफ़ेट मध्ये स्फुरद (
P2O5) मध्ये
१६ते १८%
स्फुरद
असतो.म्हणजे
१०० ग्रॅम स्फुरद देताना १६००
ग्रॅम सिंगल सुपर फ़ॉसफ़ेट
वापरावे व म्युरेट ऑफ पोटॅश
मध्ये पालांश (
k2o ) घटक
असुन मध्ये ६०%
याप्रमाणे
१५०० ग्रॅम म्युरेट ऑफ पोटॅश
वापरावे .शक्यतो
सर्व खते सरळ दिलेस लवकरजास्त
फायदा होतो .
रोपांची
निगा :-
दर
१५ दिवसांनी
|
अ.
क्र.
|
दिवस
|
खताचे
नाव व प्रमाण
|
|
१ |
१५दिवसांनी
१ वेळा
|
युरिया
१० ग्रॅम
सिंगल
सुपर फॉसफेट १० ग्रॅम
म्युरेट
ऑफ पोटॅश १० ग्रॅम
३
महिन्यातुन १ वेळा ५ किलो
कंपोस्ट अर्धा किलो निंबोळी
पेंड प्रति झाड देणे .
दर
सहा महिन्यांनी २५ ग्रॅम
सुश्म अन्न द्रव्य(
ZN,MN,BO,FE) इ.
दुय्यम
अन्न द्रव्य(
CA,MG,S) इ.
वापरावे
.पावसात
हिरवळीची खते पेरुन फुलावर
येण्या आधी जमिनीत गाडावीत.
0 ह्युमिक
अॅसिड मुळांची वाढ करणेस
दर २० दिवसांनी मुळांजवळ
ओतावे.
|
संजीवकांचा
वापर
|
अ.
क्र.
|
संजीवक
|
घटक
|
कालावधी
|
प्रमाण
|
पीक
अवस्था
|
|
१ |
वाढ
रोधक
|
इथे
फॅन
|
ताण
बसण्याकरिता |
१००
ली.
पाण्यात
५०
मिली
|
ताण
|
|
२ |
ऑक्झिन्स
|
अल्फानॅफथॅलिक
अॅसॅटिक अॅसिड
|
पाणी
दिलेवर दीड महिन्यांनी
|
१००
ली.
पाण्यात
२५
मिली |
फुलोरा
|
|
३ |
जीबरेलिक
अॅसिड
|
GA3
|
पाणी
लावल्यानंतर अडीच महिन्यांनी
|
१००
ली.
पाण्यात
४ ग्रॅम
|
लिंबु
आकाराची फळे
|
|
४
|
सायटोकायनिस्न
|
6 BA
|
पाणी
लावल्यानंतर साडेचार महिन्यांनी
|
१००
ली.
पाण्यात
१०० मिली
|
पेरु
आकाराची फळे |
|
५ |
वाढ
नियंत्रक
|
क्लोरोमॅक्वेट
क्लोराईट
|
पाणी
लावल्यानंतर सहा महिन्यांनी |
१००
ली.
पाण्यात
१५० मिली
|
फळ
पक्व अवस्था
|
सुचना
–वरिल घटकांचा वापर करताना
दुकानदाराकडुन योग्य माहिती
घेवुन औषढांचे प्रमाण तयार
करावे व पाणी स्वच्छ वापरावे
पाण्याचा सामु योग्य राहण्याकरिता
अंदाजे ५ ते ६ लिंबे पाण्यात
पिळावीत (बी
विरहीत )
किंवा
सायट्रिक अॅसिड वापरावे व
PH
पेपरने
योग्य चाचणी घ्यावी
२)
औषध
फवारणी स्वतंत्र करावी सदर
औषधे पौर्णिमा कालावधी दरम्यान
फवारलेस फायदा होतो
|
पालवीची
वाढ रोखणे आणि कार्यक्षमता
वढविणे
|
संजीवक |
फवारण्याचा
हेतु
|
|
१
डाळिंब फळ लिंबु आकाराचे
असताना पालवी आल्यास
|
सी
सी सी (
वाढ
नियंत्रक )
|
फाजील
वाढ रोखणे |
|
२
पहिल्या फवारणीनंतर७ ते १०
दिवसांनी
|
सुक्ष्म
अन्न द्रव्ययुक्त खत व NPK
graed water soluble ( 0-52-34 )
|
पालवी
परिपक्व होणे
|
|
३
दुस-या
फवारणीनंतर ७ ते १० दिवसांनी
|
सुक्ष्म
अन्न द्रव्ययुक्त खत व अॅमिनो
अॅसिड
|
पालवीची
कार्यक्षमता वाढवावी
|
बहर:-
१)
मृग
बहर – पावसाळी कालावधी
२)
हस्त
बहर – सप्टेंबर ,
ऑक्टोंबर
३)
आंबे
बहर – आंब्याबरोबर घेतल्या
जाणा-या
डाळिंब बहराला आंबे बहर म्हणतात.
कोकणामध्ये
डाळिंब लागवड करताना सप्टेंबर
पुढील कालावधी निवडणे योग्य
ठरेल
१)
काळजी-
बहर
धरण्याची तारिख निश्चित करणे
,
छाटणी
आधी खते (
कंपोस्ट
स्फुरद विरघळवणारे जीवाणु
ट्रायकोड्रामा)
मागवुन
छाटणी-
१)
पोट
छाटणी – झाडाच्या आतील भागात
फळ येण्यासाठी केलेली छाटणी
होय.
झाडाच्या
आतील भागात फळ देणा-या
काड्या ठेवण्यात येतात त्यामुळे
फळ सावलीत तयार होते
२)
पंजा
छाटणी -
हाताच्या
पंजाप्रमाणे छाटणी केली जाते
या छाटणीत झाडाच्या पोटातील
म्हणजेच आतील फांद्याचे जाळ
काढुन झाड पोकळ करण्यात येते
त्यामुळे प्रत्येक फांदीला
चांगला सुर्यप्रकाश मिळतो